लोकमंगल और लोक कल्याण के मार्ग में सबसे बड़ा व्यवधान मैं और मेरा का भाव है।यदि इस भाव से परे हट कर सेवा कार्य किया जाए तो ईश्वरीय कार्य की श्रेणी में आ जाता है। मनुष्य का स्वभाव है कि नगण्य से किया सेवा कार्य का भी श्रेय लेने का इच्छुक रहता है। यदि इस भाव को छोड़ दे तो वह सतंत्व को प्राप्त कर लेता है।