Atul
Tuesday, 16 February 2021
निःस्वार्थ सेवा
लोकमंगल और लोक कल्याण के मार्ग में सबसे बड़ा व्यवधान मैं और मेरा का भाव है।यदि इस भाव से परे हट कर सेवा कार्य किया जाए तो ईश्वरीय कार्य की श्रेणी में आ जाता है। मनुष्य का स्वभाव है कि नगण्य से किया सेवा कार्य का भी श्रेय लेने का इच्छुक रहता है। यदि इस भाव को छोड़ दे तो वह सतंत्व को प्राप्त कर लेता है।
Tuesday, 19 January 2021
देवत्व का प्रादुर्भाव
आत्मीय बन्धुओं,
ईश्वर की बनाई गई रचनाओं में सर्वोत्तम कृति मनुष्य की है।मनुष्य अपने सांसरिक बन्धनों में बन्ध कर सब कुछ भूल गया।ईर्षा , द्वेष, अहम,वासना,धन संग्रह की लोलुपता में इतना फंस गया कि चाह कर भी निकल नहीं पा रहा। मानव इस मार्ग को छोड़कर यदि अपने जीवन को परोपकार और समाज सेवा के लिए समर्पित करता है तो उसे आनन्द अनुभूति का सुखद अनुभव होगा और मनुष्य के अंदर देवत्व का प्रादुर्भाव होगा जो मनुष्य को मनुष्यता की ओर ले जाएगा।इस जीवन के सत्य पथ के मर्म को समझ गया ,वह आगे चल कर संत की श्रेणी में आया है और इतिहास के पन्नो में उस का नाम स्वर्णिम अक्षरों लिखा गया।
अतुल प्रकाश भटनागर
Saturday, 14 April 2012
Subscribe to:
Posts (Atom)